सांझ सवेरे सिर्फ पैसे की बात
ना जाने क्यों हो रहा है ये हमारे साथ
ना रोटी ना कपड़ा, चाहिये मुझे मकान
सुनते सुनते ही हो गयी हमे थकान
नज़रें देखे घर पराया
इस घर ने तो हमारा नींद चुराया
कहीं से निकल आये उनके दिल के अरमान
कैसे पूरा करें हम उनके फरमान
कहते नहीं रुकती उनकी हर अदा
येह है काम बड़ा मुश्किल सदा
कहते नहीं रुकती उनके लब
कैसे पूरी करें यह हसरत अब
पैसे नहीं हैं, तो कर्ज़ का सवाल हुआ
समझे ना कोई क्यों, येह हैं एक अंधा कुआँ
बच्चा नहीं, घर की बड़ी ज़रूरत है
ज़िंदगी खाली खाली बर्तन है
सबने अपने सपनो के दीप जलाये
धूप में हम जल के साया हो गये
पैसा! पैसा! पैसा!
है येह किस्सा कैसा!
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