Saw the following post by Sachit on FB.
क्यों इस तरह मेरी चाहत को ठुकराए जाते हो?
फूलों सा नाज़ुक मेरा दिल, क्यों इसे बेदर्दी से कुचले जाते हो?
इज़हारे-इश्क़ हो चुका है, बरसों पहले
फिर क्यों इस हक़ीक़त से इनकार किए जाते हो?
and triggered the following from me
वोह अनकहा, अनसुना एहसास,
ज़िंदा रखता हैं मेरी सांस
छुपाने का हैं जो मज़ा
दिखाने में हैं वोह कहाँ
इंकार में भी होता है इकरार
ऐसा ही हो तो हैं ज़ालिम प्यार
No comments:
Post a Comment