Friday, October 18, 2019

अभी था यहाँ गया वो कहाँ

अभी था बचपन, गया वो कहाँ ?
जब भी मैं सोचु बीत गए ये दिन कैसे ?

यादों को आवाज़ देता हूँ, छेड़ के दिलों के तार।
चला जाता हूँ एक सफर पे ढूँढ़ते हुए सारे निशान।

जीवन के हर मोड़ पे मिली मुझे, बाहों में डाले बाहें
वो भीगी भीगी यादें और मीठी मीठी बातें,
वो टूटे हुए सपने और मुट्ठी भर आसमान ,
वो नासूर ज़खमें और मरहम लगाते हुए हाथ,

ये है जीवन का साज़।

कल की सोच में आज को न छोड़ो
बीते पल या कल फिर न लौट आएगा
जैसे फिसली रेत मुट्ठी में

ये सोच कर फिर मैं शुरू करता हूँ सफर
परछाई को पीछे छोड़ कर
जब तक कहीं दूर यह सवाल लौट आये





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