आईने के सामने जो मैं खड़ा हूँ
सब कुछ धुंधला हैं क्यों
दिल की तमन्नाए थी
लेकिन दिल को हमने समझाया था भी
जो पल ढल गए उनकी यादों में
मन को मचलने न दिया हमने
सीने में जो जलन थी
हमने आग तो बुझाई भी
सपनों के जो दीप जले थे
उनकी लौ को सुलझाया भी है
वो न समझी हमें जब
तन्हाई को मंज़िल बनाई तब
आँखों में तूफ़ान हैं
पर नमी तो नहीं आने दी हैं
मैं आइना देख के हैरान हूँ
सब कुछ धुंधला धुंधला क्यों हैं
चश्मा जो निकाला परेशानी में
सब कुछ साफ़ हो गया एक घडी में
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